गांव का इतिहास

 

भिखारीरामपुर

भिखारीरामपुर गाँव का नाम लगभग 250 वर्ष पूर्व पंडित भिखारीराम मिश्र (लगुनी घृतकौसिक गोत्र) के निवास से प्रारम्भ हुआ| 1781 ईस्वी में वारेन हेंस्टिंग्स के खिलाफ महाराजा चेतसिंह के विद्रोह के समय यह गाँव बस चुका था| पंडित भिखारीराम मिश्र जी प्रतापगढ़ जनपद के कुण्डा तहशील के किलहनापुर गाँव से कोल्हुआ पाण्डेयपुर (गाँव से उत्तर में लगभग 2 किमी) आये थे | पंडितजी रामनगर के महाराजा जी के बड़े पुत्र के राजदरबार में राजस्वमंत्री के पद पर कार्यरत रहे जिससे कोल्हुआ पाण्डेयपुर राजस्व माफी मौजा घोसित हुआ| इस गाँव में पंडितजी की लगभग 100 एकड़ जमीन भी थीँ| पंडित भिखारीराम मिश्र कोल्हुआ पाण्डेयपुर से यहाँ आकर बसे और उन्ही के नाम पर इस गाँव का नाम भिखारीरामपुर पड़ा | पंडितजी के पुत्र भी राजघराने से जुड़े रहे | अपने माताजी के कहने पर पंडितजी ने रघुराम पुर में 75 बीघा जमीन लेकर एक बाग़ लगवाया |

हमारे पूर्वजों ने नटवां (औराई के पास) में एक कुंआ खुदवाया जहाँ कर्मचारी रखकर लोगों को पीने के लिए जल उपलब्ध करवाते थे |

पंडित भिखारीराम जी के तीन पुत्र पं० अहलादराम पं० प्रहलादराम और पं० विश्रामजी थे | पं० विश्रामजी के पुत्री का विवाह प्रतापगढ़ जनपद में हुआ था विवाह के बाद उनकी पुत्री के परिवार को यहीं बुलाकर बसाया गया | शुक्लजी लोग उन्हीं की संतान है | 1950-60 के दशक में ब्राह्मण बस्ती के मध्य एक पुस्तकालय बना था, जहाँ पत्र पत्रिकायें उपलब्ध रहती थी, गाँव के लोग वहाँ जाकर पढ़ते थे |

भिखारीरामपुर ग्रामसभा में ही एक राजस्व गाँव चकवैदिक भी है जो गाँव के पूर्वी भाग में स्थित है | पं० रामरूप पाण्डेयजी (नागचौरी) जो कि गोरखपुर से तीर्थयात्रा पर होते हुए यहाँ आये थे| किंवदन्तियों के अनुसार निकट के एक रोग ग्रसित राजा को कुँए के जल से ठीक कर दिया जिससे राजा द्वारा स्वेक्षा पूर्वक 51 बीघा जमीन दान में मिला और पंडित जी यही बस गए | राजा द्वारा कुँए के निकट एक शिवलिंग की स्थापना की गयी, जो रुपेश्वर महादेवजी के नाम से जाने गए| पंडित जी के तीन पुत्र पं0 श्रीराम पाण्डेय, पं० बचउराम पाण्डेय और पं० साहबराम पाण्डेय थे | पाण्डेयजी लोग उन्ही की संतान है |

गाँव की पूर्वी सीमा के निकट ही एक प्राचीन कोट स्थित है| ऐसा माना जाता है कि यहाँ भर राजा (उन्ही के नाम पर भदोही का नाम (भरदोही) भदोही पड़ा) रहते थे | राजस्थान से धर्मयात्रा पर आये मौनसों ने भरों के सत्ता का समापन कर स्वयं सत्ता ग्रहण किया| गाँव के उत्तर में (जहाँ आज गाँव का ताल है) एक तालाब था जहाँ मौनस राजाओं द्वारा शाही स्नान किया जाता था |

भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० विद्याधर मिश्र (इसी गाँव के है) जो कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद दिल्ली के सदस्य रहे है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष भी रहे है, बताते है कि यहाँ मध्य पाषाण युगीन मिटटी एवं पत्थर के उपकरण मिले है | इसी प्रकार के मिटटी के बर्तन मतेथू भिडिउरा और सरायकंसराय के टीले से भी प्राप्त हुए है जो कि पाचवी छठी शताब्दी के है| महुआपुर के समीप भी प्रथम द्वितीय शताब्दी के मिटटी के बर्तन के अभिलेख मिले है | इस प्रकार के साक्ष्य हमारे गाँव को प्राचीन ऐतिहासिकता से जुड़े होने का संकेत करते है |

गाँव क़ी कुछ किवदंतियां भी है| गाँव क़ी पूर्वी सीमा में धनशीला दीदी का एक चौर था, कहा जाता है कि इनके भाई दीक्षित बाबा राजस्व जमा करने गए थे, जहाँ उन्हें मार दिया गया था| उससे दुखी होकर धनशीला दीदी ने भी प्राण त्याग कर दिया था उसी स्थान पर उनका चौर बना था | यद्दपि वह चौर तो आज नहीं है फिर भी गाँव के लोग आज भी विवाह के पश्चात वहाँ जाकर धनशीला दीदी कि पूजा करते है|

गाँव के पूर्व में बनकट एवं हरिपट्टी, दक्षिण में डंगहर एवं शुकुलपुर, पश्चिम में बहरैची, विष्णुपुर एवं देवदासपुर तथा उत्तर में बदलीपुर एवं चकचंदा गावं स्थित है| पूर्व से ही ऐतिहासिक यह भिखारीरामपुर गाँव आज भी अपनी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सुदूर तक जाना जाता है |

नक़्शा